सोमवार, जनवरी 30, 2012

न पूछो


है जालिम ये कितना जमाना न पूछो
 मुझी से वो मेरा फ़साना न पूछो/ 

कभी सोचते है क्या खोया है हमने  
पर क्या क्या भरा है हर्जाना न पूछो/

कितने जतन कर है दिल को संभाला 
मुझे ही वो मेरा बहलाना न पूछो/ 

न बाकी बचा है गाने को कुछ भी 
वो कैसा था हमसे तराना न पूछो/

थी माहताब की रौशनी धीमी धीमी 
था क्या क्या हुआ अफसाना न पूछो/

मैं डरता हूँ सोच दुनिया की बातें 
वो आशिक को इनका डरना न पूछो/                                

न पीते थे 'आशु' कभी भी मदिरा 
आज पीकर वो गिरना गिराना न पूछो/ 

गुरुवार, जनवरी 20, 2011

वक्त


कविता करता नहीं हूँ पर कभी कभी  दिल में जब मै अकेले होता हूँ तो कुछ यूँ ही बातें आती जाती रहती हैं और आज पहली बार आपसे साझा कर रहा हूँ..बताइयेगा कैसी है.. 



वक्त से तो दिन है बन्दे ,वक्त से ही रात है
वक्त से है चाँद तारे, वक्त से आकाश है

वक्त से है सारी खुशियाँ वक्त से है सारे ग़म
वक्त की गर्दिश में है सारी दुनिया सारा कर्म

                                                 किसी को है बनता ये, किसी को है बिगड़ता
                                                 किसी को है बनता ये, किसी को है बिगड़ता
                                                 
किसी को है संवारता, किसी को है पुकारता
किसी की ज़िन्दगी में लाता खुशियों की बौछार ये

                                                 किसी की ज़िन्दगी में लाता ग़मों की बरसात ये
                                                 कभी न माफ़ करता है कभी न जुर्म करता है

वक्त तो वक्त है बन्दे वक्त तो वक्त है...