मंगलवार, नवंबर 05, 2013

वो रात आखरी...


वो रात आख़री वो मुलाक़ात ओ-सनम
है याद मुझे हर वो तेरी बात ओ-सनम।।

जो-जो भी तूने मुझको हैं इलज़ाम दे दिए 
आँख बंद सहली तेरी करामात ओ-सनम।।

आया था जो तूफ़ान मुझे याद अब भी है 
बिन छत सही है मैंने वो बरसात ओ-सनम।।

बदली है जिन्दगी मेरी बस एक ही पल में 
खुद ही तो मारी खुशियों को है लात ओ-सनम।।

इस दर्द के सैलाब में कैसे जिया हूँ मैं
न देखा तूने मुड़के इक बार ओ-सनम।।

छाई है काली घटा "आशू" के जीवन में 
अब तो खुदा भी न सुने मेरी फ़रियाद ओ-सनम।।

सोमवार, नवंबर 04, 2013

लावारिसों कि एक कतार

आज अचानक मैं अपनी डायरी के उस पन्ने पर जा पहुंचा, जहाँ बहुत समय पहले कुछ लिखर भूल सा गया था। याद ही नही था कि मैंने एक ऐसी कविता भी लिखी है जिसमें न तो बहर है न ही कोई लय, बस भाव थे जो खुद ही बहने लगे। सच मानिए मैंने नही लिखा बस लिखवा दिया गया। मुझे नही पता क्या हुआ था उस दिन बस कलम चलने लगी और मैं लिखता चला गया, बिना ये सोचे कि कुछ नियम हैं जिन्हें ध्यान में रखकर लिखना होता है। पर उस दिन मैं हर नियम भूल गया सा था और लिख गया, बस लिख गया...




सडकों पर लावारिसों कि एक कतार देखी है।
क्या उनका कोई वारिस नही होता?

बेबसी और लाचारी की मार देखी है।
हर तरफ हरसू, हर बार देखी है।

क्यों इतनी बेबसी है दुनिया में?
क्यों इतना बड़ा फैसला दिखता है?

क्या इन्हें हक़ नहीं है समानता का जीवन जीने का?
या हमारी मानसिकताएं इन्हें जीने नहीं देती।

इन्हें समाज से अलग थलग कर देती हैं।
सवाल बड़ा है, पर जवाब शायद नहीं है।
क्यों किसी के पास इस बात का जवाब नहीं हैं?

गरीबी के सही मायने लावारिस और बेबस ही जानते हैं।
भूखा रहकर जीना क्या होता है, उसे सही तरह से पहचानते हैं।

ऐसा क्या गुनाह कर दिया इन लोगों ने।
जो ये इस तरह का जीवन जी रहे हैं।

कूड़ेदान से रोटी उठाकर पेट भरना।
हर किसी के बस कि बात नहीं।

क्या आप भी ऐसे खाली पेट रह सकते हैं?
अगर नही तो सोचिये कितनी बेबसी होगी उस जगह?
जहां ये लोग रहते हैं, जीते हैं।

कितनी भयावह स्थिति होगी उस जगह।
सोचकर देखिये-

शायद उनका कुछ भला हो जाए।  

जिन्हें दिल में हम...

जिन्हें दिल में हम अब बसाने लगे थे 
वही दूर अब हम से जाने लगे थे।

जो कहते थे आँखें तेरी हम बनेंगे 
वही हमसे नज़रें चुराने लगे थे।

थी उनको जिन भी रकीबों से नफ़रत 
उन्हीं को वो अपना बताने लगे थे।

जिनपर यक़ीन था खुद से भी ज्यादा 
वही झूठा कहकर बुलाने लगे थे।

जो सोचा नहीं था खयालों में हमने 
उसे सोच सोच घबराने लगे थे।

न मांगी खुदा से थी उसकी खुदाई 
क्यों खुदा भी हमको भुलाने लगे थे।

जो मिलते थे सहरा में साहिल पे "आशू"
वही मिलने में अब कतराने लगे थे।

गुनहगार


ग़मों कि महफ़िल के मेहमान हो गए 
गुनाह किये बिना ही गुनहगार हो गए।

फूलों से की थी मोहब्बत हमने
फूलों से की थी मोहब्बत हमने 
दामन में कांटे बेशुमार हो गए।

ग़मों कि महफ़िल के मेहमान हो गए।

याद जब भी करते हैं ज़ालिम जब भी उसे 
याद जब भी करते हैं ज़ालिम जब भी उसे 
जीने कि चाहत में खुशगुमार हो गए।

ग़मों कि महफ़िल के मेहमान हो गए।
गुनाह किये बिना ही गुनहगार हो गए।

इश्क़ है या नहीं, ये पता नहीं अब तक हमें
इश्क़ है या नहीं, ये पता नहीं अब तक हमें
फिर भी यूहीं उसके प्यार में बर्बाद हो गए।

 ग़मों कि महफ़िल के मेहमान हो गए।

जब भी उसकी आँखों में देखा हमने 
जब भी उसकी आँखों में देखा हमने 
नज़रें झुकाकर वो शर्मसार हो गए।

ग़मों कि महफ़िल के मेहमान हो गए।
गुनाह किये बिना ही गुनहगार हो गए।

दिन जब आया ज़ाहिर-ए-इश्क़ का 
दिन जब आया ज़ाहिर-ए-इश्क़ का 
बयां किये बिना ही रुसवार हो गए।

ग़मों कि महफ़िल के मेहमान हो गए।

दोस्ती न मिली किसी कि हमें 
दोस्ती न मिली किसी कि हमें 
सबके दुश्मन हम ख़ास हो गए।

ग़मों कि महफ़िल के मेहमान हो गए।
गुनाह किये बिना ही गुनहगार हो गए।

मिले जब आखिरी बार उससे 
मिले जब आखिरी बार उससे 
कुछ अनजान सवालों के शिकार हो गए।

ग़मों कि महफ़िल के मेहमान हो गए।

लोगों ने पूछा मुझसे के ओरे "आशू"
लोगों ने पूछा मुझसे के ओरे "आशू"
तुम क्यों इस इश्क़ के शिकार हो गए।

ग़मों कि महफ़िल के मेहमान हो गए।
घरवालों कि नज़रों में लापरवाह इंसान हो गए।

ग़मों कि महफ़िल के मेहमान हो गए।
गुनाह किये बिना ही गुनहगार हो गए।
गुनाह किये बिना ही गुनहगार हो गए।

बेबसी (एक नारी ऐसी भी)












मैं बस स्टॉप पर बैठा अपनी डायरी में कुछ लिखने कि सोच रहा था, तभी मेरी नज़र सड़क किनारे काम करती और भीख मांगती  दो औरतों पर गयी और मैंने देखा कि वह किसी आम औरत से 50 गुणा ज्यादा काम कर रही थी। और उन्हीं के बगल में कड़ी एक सजी धजी औरत उन्हें देखकर अपनी सहेली से उन्हीं के बारे में कुछ कहकर हंस रही थी। पता नहीं कि क्या बातें हो रही थी पर उस दिन इतना जरुर सामने आया कि भारत का एक बड़ा तबक़ा ऐसा है जो अगर रोजमर्रा कि दिहाड़ी मजदूरी (भीख माँगने का काम)  न करे तो वो भूखा मर जाएगा। भूखा तो उन्हें फिर भी रहना पड़ता है पर एक वक़्त का खाना तो मिल ही जाता है। लेकिन इसे पाने के लिए इन्हें जी तोड़ नहीं जीवन तोड़ मेहनत करनी पड़ती है। और सरकारी है कि विकास कि दुहाई देती नहीं थकती। चलिए इसे छोड़ते हैं, अपनी कविता पर आते हैं।



एक नारी ऐसी भी-

दिनभर करती है काम धाम
न मिलता है आराम राम।

न घर हैं इनके पास पास 
सडकों कि हैं सरताज राज 

खाने को न हैं कुछ भी पास 
भूखी रहती दिन रात रात। 



एक नारी ऐसी भी-

बच्चों को बाधें पीठ पीठ
सडकों पर मांगे भीख भीख।

न घर हैं इनके पास पास 
सडकों कि हैं सरताज राज 

चुग चुग कर रोटी खाएं खाएं 
इसके सिवाय कुछ मिल न पाये।

 एक नारी ऐसी भी-

ओढ़न को न है केस वेस 
ये ओढ़े बादल का केस।

न घर हैं इनके पास पास 
सडकों कि हैं सरताज राज. 
To be continued...  

मंगलवार, अक्टूबर 29, 2013

मैं छोड़ आया पीछे वो सारी कहानी

मैं छोड़ आया पीछे वो सारी कहानी 
जिससे जुडी थी मेरी ये जिंदगानी 

अभी तक जुडी थी ये साँसे भी उससे 
मगर अब ये गाडी है खुद ही चलानी 

कहते हैं होती मुहब्बत सभी को 
वही पार पाती जो होती रूहानी 

समझे थे हम उनको नादान यारों 
वो निकली यहाँ पर है सबसे सयानी 

पहले तो हमको बतानी नहीं थी 
लो अब ये कहानी सुनो मेरी ही जुबानी 

हम सोचते थे मुहब्बत मिली है 
पर खुदा को भी थी हमसे नफरत निभानी 

अब तक न सीखे थे इक भी सबक हम 
एक बार में ही इनकी दौलत कमाली 

कर तो दिया है खुद से अलग अब 
"आशु" कि ले लो तुम भी सलामी

त्राहि मची है चारों ओर,अब संत बन गए सारे चोर

त्राहि मची है चारों ओर 
अब संत बन गए सारे चोर 

बड़े बड़े खोलें हैं संघ 
जिनमे धन का न कोई छोर 

कहते हैं हम संरक्षण देंगे उन असहाय लोगों को 
जो हैं भूखे, जो हैं रोते खुद को ऐसा देखकर 

 त्राहि मची है चारों ओर 
अब संत बन गए सारे चोर 

बड़े बड़े हैं दान ये लेते 
बड़े बड़े घोटाले करते 

काले दो नंबर के धन को
पलभर में सफ़ेद ये कर डालें 

त्राहि मची है चारों ओर 
अब संत बन गए सारे चोर 

कहीं भी जाएँ वहीँ कमाएं 
जनता को देते धोखा 

लेते सत्संग का भी पैसा 
माने खुद को ईश्वर जैसा 

त्राहि मची है चारों ओर 
अब संत बन गए सारे चोर 

बेहिसाब हैं धन दौलत 
और बेहिसाब हैं घर बंगले 

बड़ी बड़ी गाडी में घूमें 
खुद को माने सिद्ध बन्दे 

त्राहि मची है चारों ओर 
अब संत बन गए सारे चोर 

बनते हैं ये धर्म कि मूरत
देखें न अपनी सूरत

सारे कुकर्म हैं इनके खाते 
अपने बच्चो को भी बांटें 

जो माने इनको धर्मात्मा 
वो मूरख जग में है आत्मा 

त्राहि मची है चारों ओर 
अब संत बन गए सारे चोर

रविवार, अक्टूबर 27, 2013

मोहब्बत पर ऐतबार करना नहीं

मोहब्बत पर ऐतबार करना नहीं 
जीना है मुझको है मरना नहीं।

जो-जो चला है राह पे इसकी 
वो कहता सबसे के चलना नहीं।

बहे इतनी आंसू हैं आँखों से मेरी 
के इक बूँद भी अब तो निकलता नहीं।

जहां खाई ठोकर वहीँ तो थी मंजिल 
क्या मंजिल पे अब है पहुँचना नहीं?

जो हो जाती तुमसे मुलाक़ात मेरी 
तो ऐसे यहाँ मैं मचलता नहीं।

किसपर करोगे भरोसा ओ यारों 
यहाँ पर कोई भी तो अपना नहीं।

कश्ती भी डूबी वहां पर थी मेरी 
जहां डूबे कोई, निकलता नहीं।

है अब भी समय "आशु" बोले है तुमसे
जो संभला न फिर वो संभलता नहीं।

तेरा नाम भूल न पाऊं


चाहूँ के न चाहूँ नाम तेरा मैं लिख ही जाता हूँ 
आईने के सामने ख़ुद को कभी न पाता हूँ।

रात दिन मैं दर-बदर, राहों में फिरता रहूँ 
क्यों अकेला खुद की बातें खुद को ही समझाता हूँ।

अब न आती नींद है न है मुझे करार ही 
खुद के दुःख को मैं कभी किसी से न बतलाता हूँ।

ऐसे गयी है छोड़कर जैसे न हो रिश्ता कोई 
टूट गया रिश्ता मेरा, क्यों फिर भी इसे निभाता हूँ?

हो गयी है दूर मुझसे फिर भी है गिला नहीं 
तेरे बिन जीना पडेगा, इस बात से घबराता हूँ।

इक गीत बन गया हूँ ग़मगीन राहों में यहाँ 
इसको ही अब सुनता हूँ और सबको मैं सुनाता हूँ।

हिज़्रा-ए-ग़म को "आशु" भूल न पाऊं कभी 
चाहूँ भुलाना मैं मगर खुद ही को भूल जाता हूँ।

हिज्र



तेरे हिज्र में हमने जीकर देखा 
खून बने आंसूओं को पीकर देखा 

कतरने जो बन गए ख़्वाब ये मेरे 
तुझे याद कर कर उन्हें सींकर देखा 

कहते हैं ये वक़्त भर देता है हर इक ज़ख्म 
मेरे ज़ख्मों को तो वक़्त ने भी कुरेदकर देखा 

ग़म सहते रहे

जितने भी ग़म सहते रहे, कलम से सब बहते रहे 
करके बहाना बज़्म का, हिज्रा-ए- ग़म सहते रहे 

                                                    दर्द क्या है हमने जाना दूर होकर ऐ ख़ुदा 
                                               अपने ही आशियाँ में, हम सलीब पर लटके रहे 

    हो गया तब्दील मैं इस दर्द से उस दर्द में 
बेकाबू होकर अश्क़ भी आँखों से फिर गिरते रहे 

                                                  जिसका लिखा ग़ज़लों में वो नाम बस तेरा ही है 
                                                    बस ये तुझे बताने को हम कलम घिसते रहे 

रात दिन जो था मुझे वो इंतज़ार है तेरा 
राह पर आँखें बिछी, सारे दिए बुझते रहे 

                                                अब न मुझे है चैन ही और ही है करार 
                                          बस तेरा ही तलाश में हम दर बदर फिरते रहे 

ज़िंदा लाश बन गया "आशु" उसे ये क्या हुआ 
 अब चले जहां भी वो, वहीँ निशां पड़ते रहे!!!

मैं तब उठा हूँ नींद से!!!


दोस्तों कभी कभी हम जागकर भी सोते ह रह जाते हैं। जाने क्यों? सवाल ही एक बड़ा सवाल कि आखिर ऐसा क्यों होता है, क्यों हम नींद से बहुत देर में उठते हैं? मैं भी शायद सोता ही रह गया था, पर जब उठा तो पता चला कि बहुत देर हो गयी है। बहुत देर!!! और जब उठ ही गया तो लिखना तो बनता ही था तो लिख दिया जो भी लगा, न ही कोई बहर, न ही कोई लय बस लिखता चला गया। और देखा कि एक ग़ज़ल फिर से मेरे डायरी के पन्नों पर छप चुकी थी। आज समय मिला तो आपकी प्रतिक्रियाएं जानने के लिए अपने ब्लॉग पर डाल रहा हूँ। आप बताइये कैसी लगी।




जब सब तमाशा बन गया, मैं तब उठा हूँ नींद से 
जब हाथ से सब खो गया, मैं तब उठा हूँ नींद से 

मैं समझा जिनको हमसफ़र, वो न थे मेरे रहगुजर 
उन्होंने जब धोखा दिया, मैं तब उठा हूँ नींद से 

यकीन था जिनपर मुझे उन्होंने ही धोखा दिया 
जब लुट गया सब कुछ मेरा,  मैं तब उठा हूँ नींद से 

वो मुहब्बत ही है क्या जिसमे जुदाई है नहीं 
जुदाई कह के जब ठुकरा दिया,  मैं तब उठा हूँ नींद से 

दिन हजारों बीते कब ये न मुझे पता चला 
जब अंधकार छा गया,  मैं तब उठा हूँ नींद से 

ख़्वाबों की गहराइयों में डूबा था मैं इस कदर 
सपने जब टूटे मेरे मैं तब उठा हूँ नींद से 

गर्दिशें सब को मिले, ये पता मुझको भी है 
जब मेरी खुशियों पे ग्रहण लगा,  मैं तब उठा हूँ नींद से 

खुशियों को ढूंढता था, मैं मेरे अपनों में ही 
जब अपनों ने ही ग़म दिया,  मैं तब उठा हूँ नींद से 

अब तो देख  "आशु" सब लोग भी येही कहें 
जब हो गया बर्बाद सब ये तब उठा है नींद से 

शनिवार, अक्टूबर 26, 2013

यादों के पुलिंदें

 मैंने कहीं सूना था कि एक ग़ज़ल में अगर पांच शेर हों, तो वो पूरी मानी जाती है। उसी बात को ध्यान में रखकर एक ग़ज़ल बहुत पहले लिखी थी जो आज यहाँ लिख रहा हूँ। इसे लिखने के पीछे क्या कारण रहा है, ये तो बता नहीं सकता, क्योंकि सारी बातें नही बताई जा सकती पर अपने भाव तो आपके सामने व्यक्त कर ही सकता हूँ। तो कर रहा हूँ, बताइगा केसी लिखी है।   




अपनी यादों के पुलिंदें खंगालता रहा 
मैं तुझको उनमे हरसू संभालता रहा 

बिखर गया था टूटे पत्थर सा मैं 
बस तेरे लिए ही खुद को संवारता रहा 

तू मांगे या न मांगे मुझे दुआओं में 
मैं तुझको ही बस रब से मांगता रहा 

तू है कितनी दूर मुझसे हो गयी 
मैं तो हरसू तुझे ही पुकारता रहा 

"आशु" की बात तुझको न आई समझ 
उम्र भर इसे ही मैं मलालता रहा! 

ख़ुदा तू है अगर कहीं






शरारत दिल में होती है 
तड़पना हम को पड़ता है! 

अश्क़ आँखों में होते हैं 
सिसकना हम को पड़ता है! 

करें क्या ये बता हमें 
तू एक बार तो खुदा! 

तेरी रहमत न हो अगर 
क्यों मरना हम को पड़ता है?

हमीं ने प्यार है किया 
फिर हमें ही दर्द क्यों दिया?

जिसे न प्यार है हुआ 
वो ही तो खुश है जी रहा! 

ये तेरी कैसी मार है 
मुझी पे करती वार है! 

मेरे इस शीशे के दिल को 
तुझी ने टुकड़े है किया!

कभी तो प्रेम को तूने 
हमीं को भीग में दिया! 

कभी जब रूठ तू गया 
हमीं को लूट भी लिया! 

अगर तू है यहाँ कहीं 
मेरी फ़रियाद सुन ज़रा! 

तेरे क़दमों में बैठा हूँ 
मुझे तू दान दे ज़रा! 

तू मेरे यार को मुझसे 
कहीं पे फिर से दे मिल!

नहीं तो टूटे इस दिल को 
तू थोड़ी आस दे ज़रा! 

शरारत दिल में होती है 
तड़पना हम को पड़ता है! 

आँखों में "आशू" की आंसू 
तड़पना उसको पड़ता है!

इश्क़

ये उन दिनों की बात है जब हम भी किसी से इश्क़ किया करते थे, पर ये महसूस हुआ के वो हमसे कुछ ज्यादा ही प्यार करती थी। पर क्या करें जो सबके साथ कभी न कभी घट ही जाता है हमारे साथ भी घटा, हमें उससे अलग होना पड़ा, पर अपनी कलम को कैसे रोकते, जो आंशु बहाने को तैयार थी, क्या करते रोक ही नहीं पाए उसे और रोने दिया, छोड़ दिया उसे उसके हाल पर बस हम तो उसे चला ही रहे थे, पर लिख तो कोई और ही रहा था। पता नहीं क्या हुआ था उस दिन... ये जो कुछ भी लिख गया था आपके सामने है।



क लड़की दीवानी सी मुझसे प्यार वो इतना करती थी 

आवाज़ नही सुने वो अगर फिर रात रात भर जगती थी 

                                                                                    उसकी बेचैनी देख कर मेरा दिल भी मुझसे जलता था वो जीती थी तेरे ही लिए, तू क्यों न उसको समझा था 

यहाँ घुट घुट कर मर जाएगा, जा उससे जाकर तू मिल ले 

वो तो इतनी दीवानी है कि तेरे लिए ही ज़िंदा है 

हर पल तुझको ही याद करेतेरे बिना उसका न वक़्त कटे 
उसका जीवन इक शिक्षा है कर ले जाकर तू ग्रहण उसे
गर दिल उसका दुखायेगा                                                                                    मुंह के बल तू गिर जाएगा                                                                   
                                               उसके आंशुओं के गिरने से तू क़र्ज़दार हो जाएगा 
इक दिन तू बहुत पछतायेगा और एक दिन ऐसा आयेगा तू घुट घुट कर मर जाएगा 

जा तू मिल ले उस देवी से जो याद में तेरी जीती है 

कुछ भी न उसको भाता है तू ही उसका विधाता है 

इक लड़की दीवानी सी मुझसे प्यार वो इतना करती थी 
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के मेरे लिए जीती है और मेरे लिए ही जिंदा है 
इक लड़की दीवानी सी 
मुझसे प्यार वो इतना करती है प्यार वो इतना करती है!!!!!!!!!!!

मैं ख़ास शायद था नहीं

दोस्तों समझ तो मुझे भी नही आया कि क्या लिख दिया है, पर बस एक काफ़िया मिला तो लिखने बैठ गया, ये बिना सोचे की आखिर कैसी बनेगी बस लिख दी। माफ़ करना अगर कुछ गलत लिखा हो तो, और अगर पसंद न आये तो बताना जरुर मुझे इंतज़ार रहेगा।   


किस्मत में तेरी प्यार शायद था नहीं
मुझको भी ऐतबार शायद था नहीं 

क्यों मैं रात रात भर ऐसे ही रोता हूँ 
जीने का सुरूर शायद था नहीं

याद कर तू, वो बज़्म वो तन्हाईयां
तुझको याद मेरे यार शायद था नहीं 

मैं तो हूँ इक राही, तू मंजिल मेरी
मंजिल पे खुमार शायद था नहीं 

साक़ी से कहता हूँ के अब पीना नहीं 
उसको भी मुझसे प्यार शायाद था नहीं 

बेवफ़ा तेरी वफ़ा कहाँ गयी 
मैं ही वफ़ा का यार शायाद था नहीं 

दुःख मेरे दामन है जकड़े हुए 
सुख मेरे सरकार शायद था नहीं 

आज "आशु" ही यहाँ तडपे नहीं 
पर हर कोई यहाँ प्यार करता नहीं 

सोमवार, जनवरी 30, 2012

न पूछो


है जालिम ये कितना जमाना न पूछो
 मुझी से वो मेरा फ़साना न पूछो/ 

कभी सोचते है क्या खोया है हमने  
पर क्या क्या भरा है हर्जाना न पूछो/

कितने जतन कर है दिल को संभाला 
मुझे ही वो मेरा बहलाना न पूछो/ 

न बाकी बचा है गाने को कुछ भी 
वो कैसा था हमसे तराना न पूछो/

थी माहताब की रौशनी धीमी धीमी 
था क्या क्या हुआ अफसाना न पूछो/

मैं डरता हूँ सोच दुनिया की बातें 
वो आशिक को इनका डरना न पूछो/                                

न पीते थे 'आशु' कभी भी मदिरा 
आज पीकर वो गिरना गिराना न पूछो/ 

गुरुवार, जनवरी 20, 2011

वक्त


कविता करता नहीं हूँ पर कभी कभी  दिल में जब मै अकेले होता हूँ तो कुछ यूँ ही बातें आती जाती रहती हैं और आज पहली बार आपसे साझा कर रहा हूँ..बताइयेगा कैसी है.. 



वक्त से तो दिन है बन्दे ,वक्त से ही रात है
वक्त से है चाँद तारे, वक्त से आकाश है

वक्त से है सारी खुशियाँ वक्त से है सारे ग़म
वक्त की गर्दिश में है सारी दुनिया सारा कर्म

                                                 किसी को है बनता ये, किसी को है बिगड़ता
                                                 किसी को है बनता ये, किसी को है बिगड़ता
                                                 
किसी को है संवारता, किसी को है पुकारता
किसी की ज़िन्दगी में लाता खुशियों की बौछार ये

                                                 किसी की ज़िन्दगी में लाता ग़मों की बरसात ये
                                                 कभी न माफ़ करता है कभी न जुर्म करता है

वक्त तो वक्त है बन्दे वक्त तो वक्त है...